AADMI TO SAB JAGAH HAIN - HINDI

AADMI TO SAB JAGAH HAIN - HINDI

Product Code: Novel
Availability: 100
Rs .250
Ex Tax: Rs .250

Author- Bimla Rawar Saxena

Language-  Hindi 

Binding-  Hardcover 

Pages-  128 

Publisher-  Anuradha Prakashan 

ISBN-10 -  9385083325 

ISBN-13 -  978-9385083327 

 

 

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चर्चित कवयित्री बिमला रावर सक्सेना की कृति 'आदमी तो सब जगह है' की कविताएं अपने कथ्य में समकालीन समय-समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर जहाँ संकेत करती हैं वहाँ सवाल भी उठाती हैं µ 'क्या यही है आदमियत की परिभाषा ?' एक सामान्य सी बात है कि जब से समाज की संरचना हुयी है और आदमी ने अपने को सभ्यता के दौर से गुजरते हुए संस्कृति की नींव रखी, तभी से उसकी एक पहचान कायम हुयी और पाशविकता से मनुष्यता का चरण आरम्भ हुआ । चूंकि संस्कृति ही किसी भूमि को पुण्य भूमि बनाती है इसलिए इसकी रक्षा सर्वोपरि है । उसके परिप्रेक्ष्य में यह कहना आवश्यक है कि यह आदमी को इन्सानियत का बो/ा भी कराती है किन्तु तब से अब तक का पूरा वैश्विक परिवेश विचित्रताओं और विभिन्नताओं से पूरित है । 

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चर्चित कवयित्री बिमला रावर सक्सेना की कृति 'आदमी तो सब जगह है' की कविताएं अपने कथ्य में समकालीन समय-समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर जहाँ संकेत करती हैं वहाँ सवाल भी उठाती हैं µ 'क्या यही है आदमियत की परिभाषा ?' एक सामान्य सी बात है कि जब से समाज की संरचना हुयी है और आदमी ने अपने को सभ्यता के दौर से गुजरते हुए संस्कृति की नींव रखी, तभी से उसकी एक पहचान कायम हुयी और पाशविकता से मनुष्यता का चरण आरम्भ हुआ । चूंकि संस्कृति ही किसी भूमि को पुण्य भूमि बनाती है इसलिए इसकी रक्षा सर्वोपरि है । उसके परिप्रेक्ष्य में यह कहना आवश्यक है कि यह आदमी को इन्सानियत का बो/ा भी कराती है किन्तु तब से अब तक का पूरा वैश्विक परिवेश विचित्रताओं और विभिन्नताओं से पूरित है ।

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चर्चित कवयित्री बिमला रावर सक्सेना की कृति 'आदमी तो सब जगह है' की कविताएं अपने कथ्य में समकालीन समय-समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर जहाँ संकेत करती हैं वहाँ सवाल भी उठाती हैं µ 'क्या यही है आदमियत की परिभाषा ?' एक सामान्य सी बात है कि जब से समाज की संरचना हुयी है और आदमी ने अपने को सभ्यता के दौर से गुजरते हुए संस्कृति की नींव रखी, तभी से उसकी एक पहचान कायम हुयी और पाशविकता से मनुष्यता का चरण आरम्भ हुआ । चूंकि संस्कृति ही किसी भूमि को पुण्य भूमि बनाती है इसलिए इसकी रक्षा सर्वोपरि है । उसके परिप्रेक्ष्य में यह कहना आवश्यक है कि यह आदमी को इन्सानियत का बो/ा भी कराती है किन्तु तब से अब तक का पूरा वैश्विक परिवेश विचित्रताओं और विभिन्नताओं से पूरित है ।

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